सोमवार, 1 सितंबर 2008

मित्रता का रस

संजीव भाई जोहार..!


मित्रता का रस और अधिक सान्द्र हो जाता जब मतैक्य हो॥
अधिक सोचने की बात नहीं ( मूल उद्येश्य तो आरम्भ से एक है )
मै तो आपके श्रम से तैयार ब्लॉग 'मनोरथ' के नए टेम्पलेट की
प्रशंसा हेतु तत्पर होकर कह रहा हूँ ..हा हा हा ....!!!

लगभग परिकल्पना के निकट टेग्स का प्रतिस्थापन,
हेडर, फूटर, सादगी, रंगों एवम चित्रों का संयोजन पहले से
अधिक परिष्कृत और रुचिकर है। अब यदि आपको भी
ठीक लग रहा हो तो इसे ही चयनित किया जाए.

हाँ ! इसके अतिरिक्त थोडी सी चर्चा chhattisgadhi रचनाओं
एवम इसकी उपलब्धता के साथ प्रचार-प्रसार को लेकर है
तो जब आदरणीय बाबूजी जन्माष्टमी के कार्यक्रमों से निवृत्त
होकर जब भी चर्चा करेंगें मैं आपके साथ कांफ्रेंस करके विमर्श कर लूँगा।

साहित्य और कला जगत की रोजमर्रा की मुश्किलों और
जरूरतों से मैं परिचित नहीं हूँ , ना ही किसी भी कार्यशील
व्यक्तित्व से प्रत्यक्ष परिचित हूँ। अतएव इसका बीड़ा आप
लोगों को ही उठाना है। इसमें मेरी कार्यकारिणी भूमिका भी
आप लोगों को तय करना है. तकनीक, लेख सम्बन्धी सक्षमता आप,
आदरणीय बाबूजी साहित्य सम्पादन, संग्रहणऔर अन्य
सक्रिय भाई यथा.... युवराज। एवम अन्य जिनसे मै परिचित
नहीं हूँ अपनी क्षमता से अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।

आपका स्वप्न और सोच बहुत ही तार्किक और उत्तम है॥
क्योंकि यदि हम तकनीक का उपयोग अपने ज्ञान के सर्वांगीण उत्कर्ष
के लिए ना करें तो पहले तो स्वयं हम तदुपरांत कालांतर में आने वाली
पीढी को जवाब नहीं दे सकेंगें...!

अभी के लिए इतना ही , आपके विचारों को जानने के लिए उत्सुक रहूंगा।

ब्लॉग के लिए आपको पुनः आभार ॥!

राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा भी है....
अमर राष्ट्र, उद्दंड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र यही मेरी बोली है
यह सुधार समझौते वाली भाती नहीं मुझे ठिठोली है



स्नेह...

समीर.

1 टिप्पणियाँ:

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari 1 सितंबर 2008 को 8:41 pm  

समीर भाई धन्‍यवाद,
मुझे आत्मिक आनंद मिला है आपके दोनो ब्‍लागों को देखकर ।


आपने सचमुच तकनीकि का बेहतर इस्‍तेमाल किया है । इतनी जल्‍दी ब्‍लाग तकनीक से परिचित ही नहीं प्रवीण हो गए हैं ।

मैं अपने लोगों से ऐसी ही अपेक्षा करता हूं क्‍योंकि ब्‍लाग से संबंधित समस्‍त जानकारी हिन्‍दी में सर्वत्र उपलब्‍ध है जिसे पढने व धीरता से सीखने की आवश्‍यकता है पर लोग मुझे ही बोझा लादते हैं और बडी मायूसी से कहते हैं कि 'मुझसे यह हो नहीं रहा आप ही कर दीजिये ना'।

आपके उत्‍साह एवं प्रयास को मेरा नमन ।

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अंतर्मन

मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो, उडी जहाज को पंछी फिरि जहाज को आयो.....
जब ... कीबोर्ड के अक्षरों संकेतों के साथ क्रीडा करता हूँ यह कभी उत्तेजना, कभी असीम संतोष, कभी सहजता, तो कभी आक्रोश के लिए होता है. और कभी केवल अपने समीपता को भाँपने के लिए...

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