बुधवार, 3 सितंबर 2008

अलख

अनिल जी नमस्कार....!


बहुत आभार आपने मेरे ब्लॉग पोस्ट्स का अवलोकन किया
और अपने विचार भी दिये...आदरणीय बुधराम जी की ओर
से आपको धन्यवाद।
आपका सहयोग सदैव अनुकरणीय होगा.

हाँ एक बात अवश्य कहना चाहूँगा ....
पुलिस की आलोचना बहुत आसान है।
उतना ही जितना की मल त्याग के बाद मलद्वार को धोना... !!!!

पुलिस को संसाधन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना
किसकी जिम्मेदारी है ?

क्या पूरे तंत्र को पुलिस संचालित कर रही है

क्या पुलिस नक्सल समस्या के विरुद्ध किसी एक नीति को
अनुसरण कर पा रही है ?

और फिर नीति निर्धारण का काम किसका है ?

उसके निर्माण में पुलिस की कितनी भूमिका होती है ?

उसके क्रियान्वयन के कितने अधिकार पुलिस को दिये गए हैं ?

क्या नक्सल समस्या पुलिस की देन है

helecopter गुम हुआ .....क्या हुआ, नहीं हुआ...यह तो पता
चल जायेगा।
जब 'मैना' गुम हुआ था मैंने जबलपुर SDOP के रूप में तीन दिन
और रात उसकी तलाश अपने क्षेत्र में मीडिया बंधुओं और
स्थानीय लोगों के साथ की थी,
( सन्दर्भ हेतु आप मेरे ब्लॉग के फूटर के चित्रों को देखें।)

उपलब्ध संसाधनों से व्यवहारिक रूप में helecopter को खोजा जाना
मुश्किल नहीं दुष्कर होता है. मैना को भी हमने सेना की मदद से
ढूंढा था.....भाई.
आप आज की परिस्थितियों से वाकिफ हैं .... उसके लिए भी अलख जगाएं ।

यह कोई पुलिस का बचाव नहीं वास्तविकता से परिचय भर है...!



धन्यवाद्

6 टिप्पणियाँ:

Anwar Qureshi 3 सितंबर 2008 को 12:50 pm  

एक बात अवश्य कहना चाहूँगा .... पुलिस की आलोचना
बहुत आसान है।
उतना ही जितना की मल त्याग के बाद मलद्वार को धोना... !!!!


समीर जी आप ने ठीक कहा है किसी की आलोचना करना ठीक इसी तरह है लेकिन मैं आप को ये भी बताना चाहता हूँ अगर हेलीकाप्टर की बात करें तो ये सच ही पुलिस का निकम्मा पन है , पुलिस अपनी जवाब दारी से कहीं न कहीं कतराती है , और तो और अगर कोई ngo हेलीकाप्टर की तलाश में जाने की कोशिश भी करता है तो उसे धमकाया जाता है , अपनी नाकामी छुपाने के लिए ? आप एक जवान पुलिस अफसर है आप की सोच भी उसी तरह है , मेरे भी कुछ मित्र बस्तर के नक्सली इलाकों में पदस्थ है , और नक्सलियों का डटकर सामना कर रहें है मुझे लगता है के इस सिस्टम में जो खराबी है ये सब उसकी वजह है ... हमे दी जाने वाली जवाबदारी तो हमे ही पूरी करनी होगी ,

Priyankar 4 सितंबर 2008 को 2:44 am  

हम एक ऐसे शिकायती समाज में परिवर्तित होते जा रहे हैं जो हर प्रयास को संदेह की दृष्टि से देखने का आदी होता जा रहा है . 'सब धान बाईस पसेरी' का मसला नहीं होना चाहिए .

श्रीकांत पाराशर 5 सितंबर 2008 को 6:06 am  

Police men achhe log bhi honge, balki kahna chahiye ki hain, magar kitne?Ek talaab men ek achhi saaf suthri machhli ho aur baaki gandi hon to talab ki chhavi to achhi nahin hogi na? bhai, ek machhli hi sare talab ko ganda karne ke liye kaafi hai,fir jahan talab inse hi bhara ho to phir kya kahna. Police ke nikkamepan ki kitani dastanen sun payenge aap? Bhara pada milega itihaas. kahin kahin kuchh bhale log bhi hain police men parantu ve alag thalag pad jate hain.

GIRISH BILLORE MUKUL 5 सितंबर 2008 को 10:19 am  

समीर भाई
पोस्ट दमदार और स्पष्ट है
"उसके क्रियान्वयन के कितने अधिकार पुलिस को दिये गए हैं.....????"
इससे तो सभी जूझ रहे हैं किंतु कोई बात नहीं मुझे आपको यानी हम सबों को एक
समझदार सुबह की प्रतीक्षा करनी ही होगी
पुन:डेरों बधाइयां

दीपक 7 सितंबर 2008 को 1:48 am  

जागते हुये प्रश्न है सोते हुये लोगो के लिये !! आपकी सखी अब हमारी भी सखी हुयी !!बाइदवे ये अनिल जी अनिल पुसदकर जी है क्या?

एक अनुठा और नवीन प्रयास बधाई पुनश्च!!!

"SURE" 19 सितंबर 2008 को 8:22 am  

समीर जी आपके हर प्रश्न में एक सच्चाई छुपी है ,परन्तु हर प्रश्न का उत्तर सकारात्मक नही है,
हम सब पुरी प्रणाली को तो दोष देते आए है पर अक्सर ये भूल जाते है की हम भी उस प्रणाली के एक अहम् पात्र है पुलिस के पास कोई जादुई चिराग नही है की हाथ फेरा और समस्याओं का अंत हो गया ,समस्या खड़ी करने वाले ही उसके समाधान के लिए ढोल बजाते फिरते है ,जो आज सत्ता में है वो चुप है जो आज सत्ताविहीन है कल सत्ता में आते ही उनकी भी बोलती बंद हो जाती है.बस अब तो महान गज़लकार आदरणीय दुष्यंत जी की बानगी
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई, गंगा निकलनी चाहिए

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अंतर्मन

मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो, उडी जहाज को पंछी फिरि जहाज को आयो.....
जब ... कीबोर्ड के अक्षरों संकेतों के साथ क्रीडा करता हूँ यह कभी उत्तेजना, कभी असीम संतोष, कभी सहजता, तो कभी आक्रोश के लिए होता है. और कभी केवल अपने समीपता को भाँपने के लिए...

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