मंगलवार, 2 सितंबर 2008

निरापद

संजीव भाई...


आपने "मनोरथ" के साथ "समीर" शीर्षक से एक और ब्लॉग
तैयार कर मुझे भेंट किया है...पहले तो मैंने देखा ही नहीं था...
अब समझ में आप अपने जैसी उर्जा से मुझे भी कार्य करना
चाहते हैं जो कि बहुत मुश्किल है...!!! हा हा ...

लेकिन उत्तरदायित्व से पीछे हटना भी स्वीकार नहीं ,
अतएव आपकी इच्छा का मान रखने का प्रयास करूँगा.

पहले पहल इस पर कुछ पत्राचार को बिना आपके
अनुमति के पोस्ट कर दिया हूँ....जिसके सम्बन्ध मेरी
धारणा है कि यह सभी लोगों के बीच जाना चाहिए।
इस सम्बन्ध में आपका विचार महत्वपूर्ण होगा।
जिसका मै सम्मान करता हूँ.


अपने आदरणीय बुधराम यादव को "गुरतुर गोठ" के
सम्पादकीय दायित्व से मंडित कर दिया है....नेट पत्रिका
के आवरण पर उनका नाम उकेरे जाने के लिए मैं
आपका ह्रदय से आभारी हूँ । उनके व्यक्तित्व, कृतित्व
और आचरण का सम्मान करना एवम अक्षुण रखना भी
हमारा दायित्व होगा। क्योंकि उनके जैसे मानस लोग
लुप्तप्राय हैं........वह वस्तुतः निरापद ....साधू प्रवित्ती के
व्यक्तित्व हैं .


आप इन सबके मध्य 'मनोरथ' , 'समीर' और
मेरा भी स्मरण रखेंगे।

ऐसी अपेक्षा है ....

7 टिप्पणियाँ:

शोभा 3 सितंबर 2008 को 8:44 am  

अच्छा लिखा है। स्वागत है आपका।

Sanjeet Tripathi 3 सितंबर 2008 को 10:39 am  

शुभकामनाएं इस ब्लॉग के लिए भी

GIRISH BILLORE MUKUL 3 सितंबर 2008 को 10:50 am  

aapakaa blog chittha jagat in se sameer lal jee ne mail kiyaa hai

Anwar Qureshi 3 सितंबर 2008 को 12:25 pm  

SAMEER JI LIKHTE RAHIYE .SHUBKAAMNAYEN..

amrita 4 सितंबर 2008 को 12:03 am  

Aapake vichaaron ki abhivyakti bahut sunder hai!

राजेंद्र माहेश्वरी 5 सितंबर 2008 को 9:16 am  

सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता ।

प्रदीप मानोरिया 15 सितंबर 2008 को 10:32 pm  

बधाई स्वागत निरंतरता की चाहत
समय निकल कर मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

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अंतर्मन

मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो, उडी जहाज को पंछी फिरि जहाज को आयो.....
जब ... कीबोर्ड के अक्षरों संकेतों के साथ क्रीडा करता हूँ यह कभी उत्तेजना, कभी असीम संतोष, कभी सहजता, तो कभी आक्रोश के लिए होता है. और कभी केवल अपने समीपता को भाँपने के लिए...

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