सोमवार, 22 सितंबर 2008

दृष्टिकोण

आम आदमी और आतंकवाद ...............
"यह हकीकत अभी सोच में जगह नहीं बना पाई है कि सारी हिंसाओं का मूल उद्येश्य व्यवस्था को चुनौती देकर उसकी नपुंसकता को ललकारने का ही होता है "
आतंकवाद से निपटने की ताजा बहस में सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों की पहचान कर उन्हें दूर करने की उपाय ही तलाशे जा रहे हैं। इस कोशिश में आम आदमी की चिंता को केवल उस आतंकवाद तक सीमित किया जा रहा है , जो भीड़ भरे बाजारों में छुपाकर रखे जाने वाले बमों के जरिये उत्पन्न हो रहा है।
हम उस सामाजिक असहिष्णुता को किस तरह के आतंकवाद का नाम देना चाहेंगे और उससे निपटने के लिए किन तरीकों की खोज करना चाहेंगे, जिसमें भाषा और स्थानीयता को मुद्दा बनाकर लोगों को हिंसा का निशाना बनाया जाता है ? वे तत्त्व , जो खुलेआम सविंधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों की धज्जियाँ उड़ाते हुए आये दिन फतवे और फरमान जारी करते हैं , क्या उन लोगों से अलग और बेहतर है जो पेड़ों पर विस्फोटकों को तो लटका देते हैं, पर उन्हें तारों से नहीं जोड़ते ? धर्म के नाम पर विभिन्न समुदायों के बीच आए दिन सड़कों पर होने वाले दंगो और उनमें होने वाली मौतों का जिक्र किस किस्म की नागरिक सुरक्षा में होना चाहिए ? क्या नक्सलवाद हिंसा के कारण मौत की चपेट आने वाले नागरिकों और पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए सोचे जाने वाले उपाय आतंकवादी हिंसा के मुकाबले कुछ अलग किस्म के होने चाहिए ? सांस्कृतिक आतंकवाद के कारण उपजने वाली हिंसा का जिक्र किस तरह के अपराधों कि सूची में होना चाहिए ?
व्यवस्था का शायद इसमें कुछ निहित स्वार्थ है कि वह आतंकवाद को अलग-अलग हिंसाओं में बांटकर उससे मुकाबले की रणनीती भी अलग-अलग बनाना चाहती है, जबकि सभी स्थानों पर अपने को असुरक्षित महसूस करने वाला आदमी एक ही है। माँ-बाप की शर्त भी यही है कि जो बच्चा अपना टिफिन लेकर सुबह घर से निकला है, उसके सुरक्षित वापस लौटने कि गारंटी व्यवस्था को देनी चाहिए । उसे हर प्रकार की हिंसा से संरक्षण मिलना चाहिए, पर ऐसा हो नहीं रहा है. चूँकि हिंसा के शेष प्रकार राजनीतिक वोट बैंक को सूट करते हैं, इसलिए उनपर कोई बहस नहीं करना चाहता . इसमें किसी प्रकार के शक की गुंजाइश नहीं कि बम विस्फोटों के जरिये निरपराध नागरिकों को अपना निशाना बनाने वाले आतंकवादियों के खिलाफ प्रभावी तरीके से कार्रवाई होनी चाहिए , पर इसके लिए अगल बगल झांकने के जरुरत नहीं पड़नी चाहिए . उदाहरण दिये जा रहे हैं कि 9/11 के बाद अमेरिका में लागू किए गए कड़े सुरक्षा बंदोबस्तों के चलते कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई, पर आतंकवाद को लेकर पश्चिमी देशों कि चिंताए और उससे निपटने के उपाय भारतीय सन्दर्भों में फिट नही बैठते . ठीक वैसे ही जैसे समुद्री तूफानों के कारण अमेरिका में होने वाली तबाही और उससे निपटने के सन्दर्भ बिहार में कोसी और उड़ीसा में महानदी की बाढ़ से मचने वाले हाहाकार से काफी अलग है. हम पश्चिमी देशों से अत्याधुनिक हथियार तो खरीद सकते हैं , पर उनके इस्तेमाल के तरीके पश्चिमी नहीं हो सकते ।
आतंकवादी हिंसा को लेकर सारा सोच अंत में केवल इस बिन्दु के आसपास जमा होकर रह जाता है कि इसके कारण आम आदमी को जान माल की हानि भुगतनी पड़ती है और यह भी कि सबसे ज्यादा तबाही का शिकार गरीब आदमी ही होता है, परन्तु यह हकीकत अभी सोच में जगह नहीं बना पाई है कि सारी हिंसाओं का मूल उद्येश्य व्यवस्था को चुनौती देकर उसकी नपुंसकता को ललकारने का ही होता है। और व्यवस्था का रिस्पांस शोक सभाओं में दो मिनट के दौरान व्यक्त होने वाले सन्नाटे से ज्यादा गंभीरता लिए हुए नहीं होता। व्यवस्था की इसी उदासीनता से त्रस्त होकर आम आदमी आतंकवाद से लड़ने या उससे बचने के अपने तरीके ईजाद करने की ओर दौड़ता है और यह काफ़ी खौफनाक स्थिति है कि व्यवस्था एक मुकाम पर पहुंचकर आतंकवादियों के साथ साथ आम आदमी के निशाने पर आ जाती है।
श्रवण गर्ग जी ने अपने इस लेख के माध्यम से देश की वर्त्तमान व्यवस्था पर अपने नजरिया का एक खाका खींचा है....यह सच भी जिसे हम अनेक उदाहरणों से समझ सकते हैं-: यथा ....
१ कभी आतंकवाद के विरुद्ध , देश में समय-समय पर जातीय , कौमीय अथवा अन्य समस्यायों को लेकर होने वाले सामूहिक विरोधों से निपटने में कथित रूप से हमारे सुरक्षा बलों के अनुभव से स्कॉट्लैंड यार्ड की पुलिस भी लाभान्वित होती रही है।
२ आतंकवाद के विरुद्ध जब भी कोई स्पष्ट नीति के साथ लड़ने की बात आती है तो हम सुरक्षा और लड़ाई दोनों ही मोर्चो पर उस "आम आदमी" की भूमिका और कष्ट को अनदेखा क्यों कर दे रहे हैं।
३ इस तरह के कार्रवाई जिनसे अभी तक का इतिहास गवाह है....ज्यादा प्रभावित होने वाले लोग उस वर्ग से हैं जिनका समुचित दमदार प्रतिनिधित्व, आवाज एवम नेतृत्व उन नीति निर्धारकों तक नहीं है। जिसकी वजह से यह सूरत बदल ही नहीं रही है. एक किसी हमले में कोई इनकी परिभाषा से बड़ी क्षति तो हो फ़िर इनकी तत्परता क्या तीन चैनेल के समक्ष तीन सुइट बदलने के लायक रहती, यह गौर करने की बात हो सकती है।
4 आवश्यकता आतंकवाद के विरुद्ध एक ठोस नीति और कानून के साथ उसके पीछे के कारणों को इंगित कर जड़ से समाप्त करने की भी बनी रहेगी।
५ सुरक्षा बलों के कार्य करने के तरीके का विश्लेषण आवश्यक है, कई बार यह मान लिया जाता है कि संख्या, संसाधन एवम प्रशिक्षण में कमी के कारण यह स्वाभाविक चूक है....कदाचित उनकी नैतिक जिम्मेवारी आम आदमी से अधिक होने के कारण नैतिकता की कसौटी पर परखा जाना भी आज की परिस्थिति में अनिवार्य हो गया है।
और भी कुछ तथ्यात्मक बातों पर कभी फ़िर अपनी बातें करेंगे. --

3 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari 22 सितंबर 2008 को 5:40 pm  

बहुत बेहतरीन विश्लेषण और विचारणीय आलेख है. आपका लेखन प्रभावित करता है. बधाई एवं आभार. नवम्बर में तो मुलाकात होना ही है. :)

विक्रांत बेशर्मा 23 सितंबर 2008 को 8:19 am  

समीर जी आपने बहुत ही ज़बरदस्त लिखा है ,ये लेख सोचने पर मजबूर करता है ....हम तो आपके लेखन के फैन हो गए आज से !!!!!!!!!

दीपक 24 सितंबर 2008 को 9:05 pm  

अत्यंत विश्लेषणात्म्क लेख ।एवं विचारणीय मुद्दे!!

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मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो, उडी जहाज को पंछी फिरि जहाज को आयो.....
जब ... कीबोर्ड के अक्षरों संकेतों के साथ क्रीडा करता हूँ यह कभी उत्तेजना, कभी असीम संतोष, कभी सहजता, तो कभी आक्रोश के लिए होता है. और कभी केवल अपने समीपता को भाँपने के लिए...

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