रविवार, 28 सितंबर 2008

हिन्दी ब्लागिंग और हमारी व्यवसायिक चिंता


भाई रवि रतलामी जी के ब्लॉग http://raviratlami.blogspot.com/ से जानकारी मिलने पर अनिल जी आपके ब्लॉग http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/03/4500.html पोस्ट का अवलोकन किया। सर्वप्रथम आपको साधुवाद प्रेषित करता हूँ फ़िर अपनी बात कहता हूँ...!! हम हिन्दी लेखन में रूचि रखने वालों के साथ यह मूलभूत समस्या है कि करते कम हैं और बोलते ज्यादा हैं। मैं सबसे यह आग्रह करूँगा कि अपने गिरेबां में झाँककर देखें कि हम हिन्दी ब्लोगिंग की विधा शुरू होने के बाद कितनी निष्ठा, गंभीरता और लगन से हिन्दी लिख रहे हैं। उसकी भाषा शैली, विषयवस्तु पर कितनी मेहनत किया है।


करने से अधिक पाने की लालसा में जो हो सकता है, या जो हो रहा है वह भी नकार दिए जाने के कारण ही हिन्दी और हिन्दी लेखन की यह दशा है। हम हिन्दी की बात करते हैं लेकिन उसके दैनिक जीवन, कामकाज में उपयोग के सम्बन्ध में कभी नहीं सोचते। हम में से अधिकांश लोग मेरी तरह ही चूँकि अंग्रेजी अच्छी नहीं आती इसलिए हिन्दी लेखन करते हैं। हम हिन्दी ब्लोगिंग को अंग्रेजी की ब्लोगिंग से तुलना करते हुए यह क्यों भूल जाते हैं कि तकनीक से जुड़े सभी उपकरण एवं सुविधाएँ पहले अंग्रेजी में और फ़िर आवश्यकता प्रतिपादित होने पर हिन्दी के लिए प्रायोगिक तौर पर तैयार की जाती है।


अंग्रेजी ब्लोगिंग के साथ सुविधा इस बात की है कि तकनीक की दुनिया उसके लिए पढ़े लिखे और भरपेट लोगों की वैसे ही एक फौज खड़ा कर रखती है। अंग्रेजी ब्लोगिंग के सफर को हिन्दी से पहले शुरू कर उस चरण तक पहुँचाया जा चुका है, जहाँ से व्यवसायिक लाभ अर्जन किया जाना सुलभ है। लेकिन अभी हम उस शुरूआती चरण में है, जहाँ इस तरह के श्रम के सम्बन्ध में सोचना....हिन्दी के साथ "बालश्रम" कराने जैसा होगा। मित्रों पहले हम सर्व स्वीकार्य शब्द...NGO जैसे कार्य करते हुए..हिन्दी ब्लोगिंग को एक गंभीर वैविध्यपूर्ण मंच बनायें। फ़िर इससे व्यवसायिक लाभ तो स्वमेव प्राप्त होना आरम्भ हो जाएगा।


हम में से जिनको हिन्दी लेखन में रूचि है, तकनीक और आर्थिक रूप से सक्षम है, उनकी जिम्मेदारी पहले, अधिक और महती है कि वह अलख जगाये...और जगाये रखें । मैं इस बात से सहमत हूँ कि एक बार सक्षमता साबित होने के बाद शेष तो ......आता और होता ही जाएगा। हम इस विषय में थोड़े तंग दिल, भावुक होकर ज्यादा सोच रहें हैं । आवश्यकता व्यवहारिक होने की है..!!! शायद !!!


यह क्या कम है कि अनिल जी, तरुण जी, साकेत जी वहां पहुँचकर तकनीक, रणनीतिक ज्ञान अर्जित किए साथ ही सबके बीच उसे पहुँचाया भी। शेष रणनीतिक बिन्दु तो हिन्दी के ब्लोगर "पंडित", "विशेषज्ञ, और "गुरूजी" अक्सर हम सबके बीच "उड़न तश्तरी" में बांटते ही रहते हैं। जिसके लिए मेरा उन्हें हिन्दी ब्लागर के रूप में न केवल प्रणाम है, अपितु सिपाही के रूप में salute भी है।


और क्या कहा जाये ????.....अभी तो हिन्दी ब्लोगिंग में पैसा है नहीं ? इसलिए आपको तब तक मुझ जैसे लोगों को झेलना ही पड़ेगा।

समीर यादव




13 टिप्पणियाँ:

hi 28 सितंबर 2008 को 12:36 pm  

Bhai Samir Ji,
Aapna Kahna Uchit hai. Mai YE Sochata hun Ki Hindi Blogging mePaisa na Hone ke Karan abhi isko bhav nahi de rahe par wo din jarur aayega jab isme bhi avsar uplabdh honge tab logo ka rujhan bhi isme badhega.
Agar sahi kahun to Vyavsayikta bhi bahut mayne rakhti hai. Neki kar aur dariya me daalne wale aajkal bahut kam log milte hai.
Par jam logo ko isme Hindi Blogging se bhi paise ki khusbu aayegi to isko bhi bhav milne laga aur pratidin hame kuch behtarin blog padhne ko milenge.

GIRISH BILLORE MUKUL 28 सितंबर 2008 को 12:56 pm  

मैं सबसे यह आग्रह करूँगा कि अपने गिरेबां में झाँककर देखें कि हम हिन्दी ब्लोगिंग की विधा शुरू होने के बाद कितनी निष्ठा, गंभीरता और लगन से हिन्दी लिख रहे हैं। उसकी भाषा शैली, विषयवस्तु पर कितनी मेहनत किया है।
SAHEE WAQT PAR DIYA SAHEE SANDES

Mrs. Asha Joglekar 28 सितंबर 2008 को 3:09 pm  

कुछ ब्लॉग्ज तो हिंदी के बहुत अच्छे हैं । एग्रीगेटर भी इसंमे मदद कर सकते हैं हिंदी की बेहतरीन
डिक्शनरी उपलब्ध करा कर या उत्तम लेखन के लिये टिप्स देकर । बहुत से चिटठों में भाषा की अशुध्दियां होती हैं उनको मदद दे कर ।

Satyendra Prasad Srivastava 28 सितंबर 2008 को 6:17 pm  

आपसे पूरी तरह सहमत

मिहिरभोज 28 सितंबर 2008 को 11:55 pm  

बंधु मेरा विचार है कि हिंदी ब्लोगिंग करने वाले ज्यादातर लोग बस हिंदी मैं लिखना है इसलिए लिखते हैं,फिर ब्लोगिंग ही क्यों आप ईमेंल करते हैं कम्यूनिटी साईट जैसे ओरकुट पर लिखते हैं तो नियम बनालें कि हिंदी के अलावा कुछ भी नहीं लिखेंगे

समीर यादव 29 सितंबर 2008 को 12:08 am  

चिठ्ठा चर्चा में भाई अनूप शुक्ला ने इस पोस्ट पर "एक लाइना" टीप इस तरह दिया है.. "के क्या होगा भैये कुछ बताते तो सही" !!!! इसलिए मैंने यह सोचा कि इस पोस्ट की पृष्ठभूमि और विषयवस्तु को यही पर स्पष्ट करना ठीक होगा. सो प्रस्तुत है, चिठ्ठा चर्चा में भेजे "टुकड़े" का मूल अंश ही..
सबसे पहले तो आपकी सेवाओ , आपकी उर्जा और आपके कार्य के लिए बधाई ! मेरा चिठ्ठा भी आपके चर्चा एक लेना में स्थान पा सका, मैं अभी हिन्दी ब्लागिंग में नवागत हूँ और लिखता नहीं अपितु आप लोगों को पढता अधिक हूँ .

दरअसल "कुछ अपनी कुछ जग" की पोस्ट "हिन्दी ब्लागिंग और व्यवसायिकता की चिंता" एक प्रतिक्रियात्मक लेख था, जिसे मैंने उसी मूल स्वरुप में विचारार्थ पोस्ट कर दिया...आपने सही टिप दिया है कि "कुछ बता तो दिए होते..??" वैसे व्यवसायिकता के दृष्टिकोण से जो सफलता पूर्वक कुछ अर्जित कर पा रहे हैं उनके विचार अधिक महत्वपूर्ण हैं. मैं जहाँ तक सोचता हूँ कि ब्लागिंग शुरू करते ही लाभ अर्जन की सोच के साथ आने वाले लोग न तो निष्ठापूर्वक हिन्दी ब्लागिंग करते हैं न ही व्यवसायिक लेखन को बढ़ावा दे पाते हैं और बल्कि ऐसी नकारात्मकता के साथ चर्चा करके जो ब्लागर साथी गंभीरता लेखन कर रहें हैं, उन्हें हतोत्साहित अवश्य करते हैं.
मैं तो अनवरत आसपास के माहौल से प्रेरणा लेते हुए हिन्दी लेखन में रत रहने की हिमायत कर रहा हूँ शेष तो...हो ही जाएगा .......अनूप भाई.

आप सभी के विचार, सोच और सहयोग से हिन्दी ब्लागिंग से जुड़े प्रतिभाशाली ब्लागर्स के लिए गौरव के दिन आने में अधिक देरी नहीं दिखता है.

Gyandutt Pandey 29 सितंबर 2008 को 12:33 am  

सही है - हिन्दी ब्लॉगर्स बहुत मेहनत कर रहे हैं। पर उसमें बहाव है, वैविध्य और छनाव - दोनो की कमी है।

अशोक पाण्डेय 29 सितंबर 2008 को 7:36 am  

हमारे विचार में हिन्‍दी की असली कमजोरी हमारे देश की दोहरी राजभाषा की नीति है। यह विडंबना ही है कि जिस देश की अधिकांश जनता हिन्‍दी बोलती समझती है, उस देश का के सरकारी कार्यालयों व कोर्ट कचहरियों का काम अंगरेजी में चलता है। हिन्‍दी को सही अर्थों में देश की राजभाषा बना दी जाए, फिर देखिए हिन्‍दी से कमाई की क्षमता भी कितनी बढ़ जाती है।

दीपक 29 सितंबर 2008 को 8:47 am  

भारत ही शायद ऐसा देश है जहा अध्ययन अध्यापन और शासकिय कार्य तक विदेशी भाषा मे होते है !!

संजीव तिवारी 9 अक्तूबर 2008 को 10:23 am  

समीर जी, विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनांयें

सतीश सक्सेना 11 अक्तूबर 2008 को 4:32 am  

उम्मीद रखिये ! सब ठीक होगा !

योगेन्द्र मौदगिल 11 अक्तूबर 2008 को 7:18 am  

समीर भाई
सहमत हूं आपसे
लेकिन एक बात कि वरदी वाले भी ब्लागिंग कर रहे है
बड़ी विचित्र लगी
वैसे आप पर नहीं परिपाटी संदेहास्पद लग रही है
बहरहाल आपको साधुवाद
आपके प्रेरणास्रोत को प्रणाम

ताऊ रामपुरिया 20 अक्तूबर 2008 को 11:21 pm  

samiir जी ummeed करते हैं सब ठीक ही होगा !

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अंतर्मन

मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो, उडी जहाज को पंछी फिरि जहाज को आयो.....
जब ... कीबोर्ड के अक्षरों संकेतों के साथ क्रीडा करता हूँ यह कभी उत्तेजना, कभी असीम संतोष, कभी सहजता, तो कभी आक्रोश के लिए होता है. और कभी केवल अपने समीपता को भाँपने के लिए...

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